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बांदा। नवरात्र के नौ दिन दुर्गा के अलग-अलग अवतारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। दूसरी और प्रमुख देवी ब्रह्मचारिणी को स्नेह, धैर्य, तप और इच्छा शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इसी देवी से प्रेरित बड़ोखर खुर्द गांव की फूला देवी में कमोवेश यही गुण मौजूद हैं।

जानलेवा मर्ज कैंसर की गिरफ्त में आ जाने के बावजूद 58 वर्ष उम्र के पड़ाव में फूला देवी में निर्धन और बेसहारा लोगों के प्रति भरपूर स्नेह और गंभीर बीमारी की रोगी होते हुए भी जबरदस्त इच्छाशक्ति है। बचपन से ही तंगहाली का जीवन जी रहीं फूलादेवी मात्र आठवीं तक पढ़ी हैं। पति कल्लू यादव साधारण पशुपालक हैं। दूध के काम में फूला पति का पूरा हाथ बंटाती हैं। मात्र पांच बीघा जमीन है। अक्सर इसकी जुताई बुआई फूला खुद करती हैं। दो दशक पहले फूला को गांव की निरक्षर महिलाओं को साक्षर बनाने की धुन सवार हुई।

साक्षरता अभियान में शामिल होकर गांव की 80 महिलाओं को साक्षर बनाया। फिर 50 महिलाओं का स्वयं सहायता समूह बनाया। इसी दौरान वर्ष 2012 में फूला को लीवर में कैंसर हो गया। मुंबई के कैंसर विशेषज्ञ ने चेकअप के बाद कहा कि कैंसर अंतिम (थर्ड ) स्टेज में पहुंच रहा है। जीवन खतरे में है, लेकिन फूला देवी ने इसकी परवाह किए बिना अपनी जबरदस्त इच्छा शक्ति की बदौलत अपना मनोबल बनाए रखते हुए लोगों की निःस्वार्थ सेवा और तेज कर दी। गांव में शराब बंदी का एलान कर गांव की परचून दुकानों में बिकने वाली शराब को महिलाओं के सहयोग से नाली में बहा दिया। बोतलों को आग लगा दी।

साथ ही गांव में तेजी से पनप रही जुआ खेलने की लत के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया। जुए पर काफी हद तक लगाम लग गई। फूला ने घर घर जाकर महिलाओं को अपने बच्चे स्कूल भेजने को प्रेरित किया। उधर, इन सारे कामों के बीच फूला देवी अपनी बीमारी का मुंबई से इलाज भी करा रहीं हैं। कोरोना काल में बेहिचक लोगों के बीच रहकर उनकी मदद की। फूला देवी आज भी गांव वालों के लिए किसी देवी से कम नहीं हैं।



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