टैग : विश्व बुजुर्ग दुर्व्यवहार जागरूकता दिवस
वृद्धाश्रम का डीसी फोटो मो. खान के पास
– वृद्धाश्रमों और मनोवैज्ञानिकों की चौखट पर पहुंच रहे अपनों के दुर्व्यवहार से परेशान बुजुर्ग
अमर उजाला ब्यूरो
झांसी। कहते हैं जिस घर में बुजुर्गाें के हंसने-खिलखिलाने की आवाज सुनाई देती है, उस घर की औलादें कभी दुखी नहीं रहतीं, लेकिन शायद ये कहावत किताबों और सोशल मीडिया पर वायरल होने वाली पोस्ट तक ही सीमित है। जिसे लोग एक-दूसरे को घर के बुजुर्गों की सेवा का दम भरते हुए शेयर करते रहते हैं…। बात असल जिंदगी की करें तो बुजुर्ग कहीं सड़क और पार्कों के किनारे अकेले बैठे दिखते हैं, तो कभी वृद्धाश्रम में अपने आंसू छिपाते हुए सिसकते हैं।
सिद्धेश्वर नगर स्थित वृद्धाश्रम के उप प्रबंधक प्रमोद कुमार शर्मा बताते हैं कि कुछ साल पहले तक वृद्धाश्रम में बुजुर्गों की संख्या काफी कम थी, लेकिन धीरे-धीरे उनकी संख्या बढ़ती जा रही है। वृद्धाश्रम में इन दिनों अपनों के सताए 102 बुजुर्ग रह रहे हैं। स्थिति यह है कि जो किसी शर्म या रुतबे के कारण अपने बुजुर्गों को वृद्धाश्रम नहीं छोड़ पाते हैं, वह घर की चहारदीवारी में ही उनकी जिंदगी को जीते जी इस कदर नर्क बना रहे हैं कि चोरी-छिपे मनोवैज्ञानिकों की चौखट तक पहुंचने लगे हैं। वह बताते हैं कि उनकी अपनी औलादों का दुर्व्यवहार उन्हें जीते जी मार रहा है।
केस-1
बच्चों को देखे बिना ही निकल गए प्राण
77 साल के बुजुर्ग तुलसीदास कुछ महीने पहले जिला अस्पताल में मरणासन्न हालत में अपने बेटे को याद करके आंसू बहाते रह गए। वह बताते थे कि घर में उनके लिए ही जगह नहीं थी। बच्चे ही वृद्धाश्रम छोड़ गए। गिरने से उनका पैर टूट गया था। हालत खराब होने पर वृद्धाश्रम संचालकों ने उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया था। जहां वह हाथ जोड़कर कहते थे… मरने से पहले बच्चों को देखना चाहता हूं, लेकिन कोई नहीं आया। वह कुछ ठीक हुए तो वृद्धाश्रम लौटे। आश्रम संचालकों के कहने पर बेटा वहां पहुंचा। लेकिन, तब तक बेटे और परिवार को याद करते हुए उनके प्राण निकल चुके थे।
केस-2
बाल विधवा अपनों के बीच हो गई बेगानी, छोड़ गए वृद्धाश्रम
अपनों की ठुकराई तकरीबन 75 साल की महिला काशी वृद्धाश्रम में दिन काट रही हैं। बताते हैं कि शादी के कुछ साल बाद ही वह बाल विधवा हो गईं। ससुराल में कोई अपनाने वाला नहीं रहा तो वह मायके आ गईं। लेकिन, समय के साथ उम्र बढ़ती गई और रिश्तों की डोर टूटती गई। माता-पिता की मौत के बाद वह अपनों के बीच ही बेगानी हो गईं। उनके अपने ही उन्हें दो रोटी नहीं दे पाए। डेढ़-दो साल पहले परिवार के कुछ लोग और पड़ोसी उन्हें वृद्धाश्रम छोड़ गए। वह दिन भर रोती रहती थीं, लेकिन वृद्धाश्रम में रहने वाले दूसरे बुजुर्गों का दर्द सुनकर वह अपना गम भूलने लगीं हैं।
केस-3
मां को अकेले छोड़ विदेश में रह रहे बच्चे
शहर के एक संभ्रांत परिवार की तकरीबन 70 साल की बुजुर्ग महिला सरोजनी (बदला नाम) के दोनों बेटे विदेश में रहते हैं। पति की मौत के बाद वह झांसी में अकेले रह गईं। बेटे-बहू उन्हें साथ नहीं ले जाते हैं, वह हर महीने उन्हें घर खर्च के पैसे तो भेजते हैं लेकिन उनका कहना है कि वह ग्रामीण परिवेश से हैं, विदेशी कल्चर में ढल नहीं पाएंगी। ऐसे में अकेली सरोजनी खुद को मानसिक रूप से बीमार मानने लगी हैं। वह मनोविज्ञान केंद्र में फोन करके अपनी व्यथा बताकर मन हल्का कर रही हैं। मनोवैज्ञानिक उन्हें जिंदगी अपने तरीके से जीने के लिए मोटीवेट कर रहे हैं।
महीने में बुजुर्गों के आठ-दस केस आ रहे
मंडलीय मनोविज्ञान केंद्र झांसी के मनोवैज्ञानिक डॉ. मनीष मिश्रा बताते हैं कि केंद्र में बुजुर्गों के महीने में आठ से दस केस आ रहे हैं। इनमें कई बुजुर्ग अपने बच्चों के दुर्व्यवहार से परेशानी बताते हैं। कुछ बताते हैं कि बच्चों के पास उनके लिए समय नहीं है। कोई बात नहीं करता। खान-पीना तक आदर से नहीं मिलता। वहीं, कुछ बताते हैं कि बच्चे उन्हें छोड़कर विदेश में रह रहे हैं। वह न तो उन्हें साथ ले जाते हैं और न ही उनसे मिलने आते हैं। मनोवैज्ञानिक ललित कुमार सिंह बताते हैं कि बुजुर्गों को खुश रहने के लिए मोटीवेट कर उनकी काउंसलिंग की जाती है।
ऐसे कर रहे बुजुर्गों की काउंसलिंग
– बच्चे साथ नहीं दे रहे तो अपनी उम्र के लोगों से मेलजोल बढाएं।
– उनसे बात करें जो आपकी फिक्र करते हैं, सुबह की सैर, शाम को पार्क जाएं।
– हर दिन कुछ नया सीखें, अपने जरूरी काम खुद करें, फेसबुक के जरिए मित्रों को खोजें।
– जिंदगी के अनुभव कागज पर लिखें, मन हल्का होगा, मनपसंद संगीत सुनें।
– अपने हुनर को आगे बढ़ाएं और बेहिचक काउंसलर की सलाह लें।
