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फोटो- 01 अधांव गांव में किसानों द्वारा इस तरह खेतों में की जा रही है मेड़बंदी।
बारिश का पानी खेतों में रोकने के लिए जुटे किसान
मन की बात में पीएम ने की थी गांव की सराहना
संवाद न्यूज एजेंसी
बांदा। मन की बात में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सराहना से उत्साहित अधांव गांव के किसानों ने पूरे गांव में बारिश का पानी रोकने के लिए खेतों की मेड़बंदी की मुहिम छेड़ दी है। बारिश का पानी खेतों में रोकने के लिए आसपास के गांवों के किसानों को भी प्रोत्साहित कर रहे हैं। इस मुहिम से किसानों को जोड़ने के लिए चौपाल और बैठकों में जागरूक किया जा रहा है। मेड़बंदी से गांव का जलस्तर भी बढ़ रहा है।
बबेरू क्षेत्र के बेहद पिछड़े अधांव गांव में कुछ किसानों ने श्रमदान से खेतों पर मेड़ बनाकर बारिश का पानी रोका था। अभियान के संयोजक गांव के ही युवा और शोध छात्र रामबाबू तिवारी हैं। संपन्न किसानों ने मेड़बंदी का काम ट्रैक्टरों से कराया। 27 जून 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेडियाे प्रसारण मन की बात में अधांव गांव की इस मुहिम का जिक्र करते हुए किसानों की सराहना की थी। नतीजतन पूरे देश में अधांव गांव चर्चा में आ गया।
संयोजक रामबाबू ने बताया कि मेड़बंदी पूरे उत्साह से चल रही है। हर किसान की कोशिश है कि बारिश का एक-एक बूंद पानी बर्बाद न हो। उन्होंने खुद के सात बीघा खेत में मेड़बंदी की है। मेड़बंदी होने वाले खेतों में उपज भी बढ़ी है। अब बारिश के दस्तक देते ही गांव के अधिकांश किसान मेड़बंदी अभियान में जुट गए हैं। साथ ही श्रमदान से गांव के तालाबों की सफाई और मरम्मत कराई जा रही है। उधर अधांव से सबक लेकर पड़ोसी गांव भभुवा, पिंडारन आदि गांवों में भी खेतों में मेड़बंदी का काम जारी है।
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अधांव गांव के किसान सचिन ने अपने चार बीघा और राकेश ने पांच बीघा खेत में मेड़बंदी कराई है। भभुवा गांव के किसान कालका सविता ने सात बीघा, रामजी ने आठ बीघा, राजा भइया तिवारी ने चार बीघा में मेड़बंदी कराई है।
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खेतों की मेड़बंदी कराने वाले किसानों का कहना है कि इससे कई लाभ होते हैं। उपजाऊ मिट्टी बह नहीं पाती है। खेत में लंबे अर्से तक नमी बनी रहती है। इससे फसल की बार-बार सिंचाई नहीं करनी पड़ती है। इससे उपज भी बेहतर होती है। कम सिंचाई होने से फसल में लागत भी कम आती है।
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फोटो-02, शोध छात्र रामबाबू तिवारी।
मेड़ों पर पौधे भी लगा रहे किसान
अभियान के संयोजक रामबाबू बताते हैं कि मेड़ों पर पौधरोपण भी किया जा रहा है। शुरुआत में उन्होंने तीन बीघा खेती में मेड़बंदी कराई थी। इसमें सिर्फ सात हजार रुपये लागत आई थी। इसके बाद चार बीघा की और मेड़बंदी कराई। मेड़ पर पौधारोपण कराया। यहां नहर आदि नहीं होने से धान की फसल तो नहीं हो पाती, लेकिन चना और मसूर की पैदावार अच्छी होती है।
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मेड़बंदी कराने वाले किसान ले रहें दो फसलें
बुजुर्ग किसान भदुवा गर्ग ने बताया कि उनके पास 15 बीघा खेत है। नहर किनारे के आठ बीघा चक में मेड़बंदी कराई है। इसमें 12700 रुपये लागत आई, लेकिन फायदा कई गुना अधिक मिल रहा है। नहर के भराेसे खेती नहीं हो पाती थी। मेड़बंदी के बाद से चक में गेहूं के अलावा धान की भी फसल हो रही है। यदि अन्ना मवेशियों से सुरक्षा मिल जाए तो तीसरी फसल खासकर मूंग की पैदावार अच्छी होगी। किसानों का यह भी कहना है कि पूर्व में एक ही फसल होने के चलते परिवार के सदस्य दूसरी फसल के सीजन में बेरोजगार हो जाते थे। इसके चलते उन्हें बाहर जाकर मजदूरी करनी पड़ती थी। मेड़बंदी के बाद दो फसलें मिलने से अब बाहर नहीं जाना पड़ता है।
